इस यात्रा में रणजीत सिंह जी ने अपना अनुभव साझा किया।

प्रस्तावना: जब सपने पैडल से जुड़ जाते हैं

कुछ यात्राएँ दूरी से नहीं मापी जातीं। वे मापी जाती हैं दर्द से, धैर्य से, और उस दृढ़ संकल्प से जो आपको तब भी आगे बढ़ाता है जब शरीर का हर अंग चीख-चीखकर कह रहा हो, “बस करो, अब नहीं हो सकता।”

26 जनवरी 2026। गणतंत्र दिवस। जब पूरा देश तिरंगा फहराने की तैयारी कर रहा था, तब उदयपुर के पाँच साइकिल योद्धाओं ने एक अलग ही तरह का झंडा फहराने का फैसला किया—हिम्मत का, हौसले का, और हार न मानने का।

साइकिलों की चेन की लयबद्ध आवाज़, एक-दूसरे को देखकर आने वाली हल्की मुस्कान, और मन में यही एहसास कि अब रुकना गुनाह होगा। पाँचों साइकिलिस्ट एक लाइन में, एक ही गति में, जैसे कोई सैन्य परेड हो—लेकिन यह परेड थी हौसले की, हिम्मत की।


रात के 3:45 बजे: जब अँधेरे ने पूछा, “तुम्हारी हिम्मत कितनी है?”

उदयपुर की सड़कें सुनसान थीं। ठंडी हवा ऐसी चल रही थी जैसे कह रही हो, “अभी घर लौट जाओ, अभी भी वक्त है।” आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे, और पूरा शहर गहरी नींद में डूबा हुआ था। घड़ी में रात के 3:45 बज रहे थे—वह समय जब सामान्य लोग सपनों में खोए होते हैं।

लेकिन शरद जी जैन, भवानी जी पंड्या, राजेंद्र जी शर्मा, पर्वत सिंह जी और रणजीत सिंह जी सामान्य लोग नहीं थे। वे पाँच ऐसे साइकिल योद्धा थे जिन्होंने एक असंभव-सा लक्ष्य रखा था: उदयपुर से सालंगपुर बालाजी (गुजरात) तक 417 किलोमीटर की दूरी जो उन्होंने मात्र 17 घंटे में तय कर ली।

साइकिलें तैयार थीं। बोतलों में पानी भरा था। और दिल में एक सवाल जो हर किसी के मन में था लेकिन किसी ने जुबान पर नहीं लाया: “क्या सच में हम कर पाएँगे?”

पीछे सहायक गाड़ी में प्रोफेसर साहब और राहुल जैन बैठे थे—दो ऐसे साथी जो इस पूरी यात्रा में हर मोड़ पर छाया की तरह साथ रहे, हर ज़रूरत से पहले ही समझ गए कि क्या चाहिए।

पैडल घूमा। साइकिल की चेन की आवाज़ सन्नाटे को चीरती हुई निकली। और बस, यात्रा शुरू हो गई—वह यात्रा जो सिर्फ़ सड़कों पर नहीं, बल्कि अपने भीतर भी होनी थी।


पहले 50 किलोमीटर: जब शरीर और मन की पहली जंग हुई

अँधेरे में साइकिल चलाना एक अलग अनुभव है। सड़क दिखती नहीं, बस महसूस होती है। हर मोड़ एक सवाल है, हर उतार-चढ़ाव एक परीक्षा। पहले 50 किलोमीटर बिना किसी बड़े ब्रेक के पूरे हुए—यह सिर्फ दूरी नहीं थी, यह खुद को जगाने का समय था।

शरीर धीरे-धीरे नींद से बाहर आ रहा था। मांसपेशियाँ सख्त थीं, पैर भारी लग रहे थे, लेकिन दिमाग पहले ही समझ चुका था कि आज आराम की कोई गुंजाइश नहीं है। हर पैडल के साथ यही मंत्र था: “एक किलोमीटर और। बस एक किलोमीटर और।”

और फिर सूरज उगा।

धीरे-धीरे आसमान में लाली फैली, फिर नारंगी रंग छाया, और फिर सुनहरी रोशनी ने पूरी दुनिया को रोशन कर दिया। उस पल लगा जैसे खुद भगवान ने कहा हो, “हाँ बेटा, तुम सही रास्ते पर हो।”


140 किमी पर पहला बड़ा पड़ाव: जब चाय ने खुशी से ज़्यादा ऊर्जा दी

श्यामलाजी मंदिर पार करने के बाद, लगभग 140 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद, पहली बार साइकिलें रुकीं। होटल अशोक पलाव—एक साधारण-सा ढाबा, लेकिन उस समय यह किसी पाँच सितारा होटल से कम नहीं था।

करीब 30 मिनट का ब्रेक। लेकिन क्या 30 मिनट!

गरम-गरम चाय, जिसकी भाप उठ रही थी। मक्खन से चमचमाते पराठे। मटर-आलू की सब्ज़ी जिसमें मसाले इतने सही थे कि हर निवाला स्वर्ग जैसा लगा। ब्रेड-जैम, और कुरकुरे डोसे जो कुरकुरे और नरम दोनों थे।

यह सिर्फ नाश्ता नहीं था। यह जीवनदान था। यह वह पल था जब शरीर को सिर्फ कैलोरी नहीं मिली, बल्कि मन को भी भरोसा मिला कि “हाँ, हम कर सकते हैं। हम कर रहे हैं।”

थकान अभी भी थी, लेकिन उत्साह उससे ज़्यादा था। चाय की आखिरी चुस्की के साथ, पाँचों ने एक-दूसरे को देखा, बिना कुछ कहे सब समझ गए—अब अगला पड़ाव सिर्फ मंजिल ही है।


राजस्थान-गुजरात बॉर्डर: जब साइकिल कंधे पर उठानी पड़ी और इंसानियत दिखी

राजस्थान-गुजरात बॉर्डर पर पहुँचने पर एक अप्रत्याशित दृश्य सामने था—तीन ट्रकों का भीषण एक्सीडेंट हुआ था और घंटों लंबा जाम लगा हुआ था। गाड़ियों की कतारें मीलों तक फैली थीं। गुस्साए ड्राइवर, चिल्लाते लोग, हॉर्न की कर्कश आवाज़ें।

लेकिन साइकिलिस्ट? उनके पास एक फायदा था जो किसी गाड़ी वाले के पास नहीं था—वे साइकिल को कंधे पर उठा सकते थे।

और यही किया उन्होंने। एक-एक करके, सभी ने अपनी साइकिलें कंधे पर उठाईं और जाम के बीच से निकलने लगे। ट्रक के बगल से, कार के पीछे से, बस के सामने से—वे निकलते रहे।

राहगीर हैरान थे। कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बना रहे थे। एक बुजुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवान आपको सलामत रखें, बेटा।” एक युवक ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, “वाह! यही है असली भारत!”

कुछ लोग सलाम कर रहे थे, कुछ ताली बजा रहे थे। उस पल में पाँचों को एहसास हुआ कि वे सिर्फ अपने लिए नहीं चल रहे—वे उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा बन रहे थे जो उन्हें देख रहे थे।

जाम पार करने के बाद, जब फिर से खुली सड़क मिली, तो राहत की एक लंबी साँस ली सबने। लेकिन राहत सिर्फ कुछ मिनटों की थी।


हिम्मतनगर के बाद का संकट: जब टीम स्पिरिट सच में परखा गया

हिम्मतनगर पार करने के कुछ किलोमीटर बाद, अचानक एक आवाज़ आई—”छस्स्स्स…”

राजेंद्र जी शर्मा की साइकिल का टायर पंचर हो गया था। वे थोड़ा आगे निकल गए थे, जहाँ से दायीं ओर मुड़ना था वह नहीं लिया और 3 किलोमीटर आगे चले गए।

यह सिर्फ एक पंचर नहीं था—यह एक परीक्षा थी। 417 किलोमीटर की यात्रा में, हर मिनट कीमती था। हर सेकेंड मायने रखता था।

हमारे शरद जी जैन तुरंत रुक गए, ये दोनों साथ में चल रहे थे। उन्होंने अपनी साइकिल किनारे लगाई और राजेंद्र जी के पास आए। बाकी साथी जिन्होंने सही दायाँ मोड़ लेकर आगे बढ़े—लेकिन सिर्फ इसलिए नहीं कि वे छोड़कर जा रहे थे, बल्कि इसलिए कि उन्हें सही रास्ता पकड़ना था और फिर इंतज़ार करना था।

प्रोफेसर साहब और राहुल जैन तुरंत सहायक गाड़ी से औज़ार लेकर आए। पंचर की मरम्मत शुरू हुई। पसीना बह रहा था, लेकिन हाथ स्थिर थे। कुछ ही मिनटों में टायर ठीक हो गया।

और फिर, कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद—सभी फिर एक साथ थे।

यह पल साबित कर गया कि यह यात्रा किसी एक की नहीं थी। यह पूरी टीम की थी। “कोई पीछे नहीं छूटेगा”—यह सिर्फ एक नारा नहीं था, यह उनका वादा था, उनका विश्वास था।


गांधीनगर इन्फोसिटी: जहाँ भोजन नहीं, भावनाएँ परोसी गईं

गांधीनगर इन्फोसिटी पहुँचने पर एक खूबसूरत आश्चर्य इंतज़ार कर रहा था। रणजीत सिंह जी के मित्रों ने उनके आने की खबर सुनी थी और एक भव्य स्वागत की तैयारी कर रखी थी।

पेस्ट्री, रसमलाई, ताज़ा पराठे, मिठाइयाँ, फल, जूस—सब कुछ वहाँ था। लेकिन इन सब से ज़्यादा कीमती थी वह चमक जो मित्रों की आँखों में थी। वह गर्व, वह सम्मान, वह विश्वास जो उन्होंने दिखाया।

“तुम लोग कर रहे हो यार! पूरे 417 किलोमीटर!” एक मित्र ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

यह सिर्फ भोजन नहीं था। यह भावनात्मक ऊर्जा थी। यह वह पल था जब थके शरीर में सिर्फ खाना नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और हौसला भर गया। कभी-कभी सबसे ज़रूरी ईंधन पेट्रोल या डीज़ल नहीं होता—वह होता है किसी की मुस्कान, किसी का विश्वास।

खाना खत्म हुआ, लेकिन दिल भर गया था। अब बची हुई दूरी और भी आसान लगने लगी। लेकिन असलियत में, सबसे बड़ी चुनौती अभी बाकी थी।


शाम का घना यातायात: जब धैर्य परखा गया

शाम पाँच बजे के बाद जैसे-जैसे वे शहरी इलाकों में प्रवेश कर रहे थे, यातायात इतना घना हो गया जैसे कोई विशाल जुलूस निकल रहा हो। गाड़ियाँ दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे—हर तरफ। हॉर्न की आवाज़ें, धुआँ, शोर।

लेकिन साइकिलिस्ट शांत दिमाग से आगे बढ़ते रहे। उन्होंने एक लेन पकड़ी और उसी में रहे। न जल्दबाजी, न घबराहट। बस एक स्थिर गति, एक स्थिर मन।

यह आसान नहीं था। हर कुछ मीटर पर रुकना पड़ता। फिर चलना। फिर रुकना। लेकिन पैडल घूमते रहे, पहिए घूमते रहे।


रात की काली कॉफी: जब एक कप ने घंटों की ताकत दे दी

रात होते-होते थकान चरम पर पहुँच गई थी। शरीर लगभग विद्रोह करने लगा था। पैर सुन्न हो रहे थे, कमर में दर्द, गर्दन अकड़ी हुई।

तभी प्रोफेसर साहब ने सहायक गाड़ी रोकी और एक थर्मस निकाला। उन्होंने ठंडे पानी में तैयार की गई ताज़ा काली कॉफी तीन-तीन घूँट में पाँचों को पिलाई।

उस एक कप काली कॉफी ने क्या जादू किया, यह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

जैसे बिजली के झटके ने शरीर को फिर से जगा दिया। आँखें खुल गईं, दिमाग तेज़ हो गया, मांसपेशियों में जान आ गई। वह कॉफी सिर्फ पेय नहीं थी—वह जीवनदायिनी अमृत थी।

“बस साहब, अब तो पहुँचना ही है,” भवानी जी पंड्या ने कहा, और सभी ने सिर हिलाया।


350 किमी के बाद: जब असली मुसीबत आई

लगभग 350 किलोमीटर के बाद, सबसे बड़ी परेशानी सामने आई।

लगातार साइकिल की सीट पर बैठे रहने से, लगातार पैडल मारने से, शरीर के कुछ हिस्सों में घर्षण, जलन और असहनीय दर्द शुरू हो गया।

कागज़ों में भले ही सड़क समतल दिखे, लेकिन हकीकत में हर किलोमीटर पहाड़ जैसा भारी लगने लगा। हर पुलिया एक परीक्षा, हर हल्की चढ़ाई एक चुनौती। सड़क के छोटे-छोटे झटके ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने शरीर में सुई चुभो दी हो।

दर्द इतना बढ़ गया कि साइकिल चलाना लगभग नामुमकिन हो गया।

तभी काम आई एक छोटी सी चीज़ — वैसलीन।

राहुल जैन ने तुरंत सहायक थैले से वैसलीन की ट्यूब निकाली। सभी ने राहत की साँस ली। वैसलीन लगाई गई उन जगहों पर जहाँ घर्षण सबसे ज़्यादा था।

और फिर — राहत मिली।

जलन कम हुई। दर्द काबू में आया। साइकिल फिर से चलने लायक बन गई।

सभी का एक ही स्वर था: “अगर यह साथ नहीं होती, तो शायद 417 किलोमीटर सिर्फ एक सपना ही रह जाता।”


बगोदर में आखिरी ईंधन: जब खाना ताकत बना, इच्छाशक्ति हथियार बनी

बगोदर पहुँचने पर एक रेस्टोरेंट में रुके। यह आखिरी खाने का पड़ाव था। पंजाबी-गुजराती थाली—रोटी, सब्ज़ी, दाल, चावल, दही, सलाद। और मशहूर काजू करी जिसकी खुशबू ही ऐसी थी कि भूख दोगुनी हो जाए।

सभी ने पेट भर खाया। यह जानते हुए कि इसके बाद का हर किलोमीटर सिर्फ इच्छाशक्ति से चलाना होगा। खाना ख़त्म होने के बाद, कोई नहीं बोला। सब जानते थे—अब बस कुछ ही घंटे बाकी हैं।

अब शरीर में ताकत नहीं बची थी। पैर काँप रहे थे, हाथ सुन्न हो रहे थे, आँखें भारी लग रही थीं। लेकिन दिल में एक आग जल रही थी—“हम यहाँ तक आए हैं, अब वापस नहीं जाएँगे।”


रात के 2 बजे, सालंगपुर बालाजी: जब 417 किमी पूरे हुए और सन्नाटा बोला

हमारे साथी भवानी जी हम सबसे 1 घंटा पहले ही मंदिर पहुँच चुके थे और उन्होंने आगे की व्यवस्था संभाल ली और हर थोड़ी देर में वे फोन पर हमसे जानकारी लेते रहे।

रात करीब 2 बजे, जब पूरी दुनिया गहरी नींद में थी, जब सड़कें सुनसान थीं, जब आसमान में चाँद धीरे-धीरे छुपने लगा था—तब पाँच साइकिल योद्धा सालंगपुर बालाजी के मंदिर के सामने पहुँचे।

417 किलोमीटर। 17 घंटे। एक टीम। एक लक्ष्य। पूरा हुआ।

कोई ढोल नहीं बजा। कोई आतिशबाज़ी नहीं हुई। कोई भीड़ नहीं थी तालियाँ बजाने के लिए।

बस पाँच चेहरों पर एक गहरा संतोष, एक अजीब-सा सुकून, और आँखों में गर्व की वह चमक जो शब्दों में बयान नहीं हो सकती।

वे बालाजी के चरणों में झुके। माथा टेका। और उस पल, वे सब जान गए कि:

  • साइकिल सिर्फ मशीन नहीं, जीवनसाथी है।
  • दोस्ती का मतलब सिर्फ साथ चलना नहीं, साथ रुकना भी है।

उपसंहार: यह अंत नहीं, शुरुआत है

417 किलोमीटर की यह यात्रा सिर्फ एक साइकिल राइड नहीं थी। यह एक सबक थी। यह एक प्रेरणा थी। यह एक सबूत थी कि जब इरादा पक्का हो, तो रास्ते खुद बनते हैं। जब हिम्मत हो, तो मंज़िलें खुद पास आती हैं।

शरद जी जैन, भवानी जी पंड्या, राजेंद्र जी शर्मा, पर्वत सिंह जी, रणजीत सिंह जी—ये नाम नहीं, प्रेरणा हैं। और प्रोफेसर साहब और राहुल जैन—ये सिर्फ सहायक दल नहीं, असली नायक हैं जिन्होंने पर्दे के पीछे से पूरी यात्रा को संभाला।

तो अगली बार जब आप सोचें कि “यह बहुत मुश्किल है,” “यह नामुमकिन है,” “मैं नहीं कर पाऊँगा”—तो याद कीजिए:

रात के 3:45 बजे, 26 जनवरी 2026 को, उदयपुर से पाँच साइकिल योद्धाओं ने 417 किलोमीटर का सफर मात्र 17 घंटे में तय किया। अँधेरे में, ठंड में, दर्द में, थकान में—लेकिन हार नहीं मानी।

और अगर वे कर सकते हैं, तो आप क्यों नहीं?

जय हिंद। जय भारत। और जय उन सभी योद्धाओं की जो हर दिन अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। 🚴‍♂️🇮🇳

One thought to “417 किलोमीटर साइकिलिंग: उदयपुर से सालंगपुर बालाजी तक एक अद्भुत यात्रा”

  • hemendra singh chouhan

    Speed nahi , dedication bolta he💯
    Salute to your stamina 👏

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